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विभूति पाद

विभूति पर · 55 में से 55 सूत्र

  1. 3.1देशबन्धश्चित्तस्य धारणाdeśa-bandhaś cittasya dhāraṇāचित्त को एक स्थान में बाँधना धारणा है।
  2. 3.2तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानम्tatra pratyayaika-tānatā dhyānamवहाँ प्रत्यय की एकतानता (अविच्छिन्न प्रवाह) ध्यान है।
  3. 3.3तदेवार्थमात्रनिर्भासं स्वरूपशून्यमिव समाधिःtad evārtha-mātra-nirbhāsaṃ svarūpa-śūnyam iva samādhiḥवही ध्यान जब केवल अर्थ का भास कराता है और मानो अपने स्वरूप से शून्य हो जाता है, तब समाधि है।
  4. 3.4त्रयमेकत्र संयमःtrayam ekatra saṃyamaḥये तीनों एक ही (विषय) पर मिलकर संयम हैं।
  5. 3.5तज्जयात्प्रज्ञालोकःtaj-jayāt prajñālokaḥउस (संयम) के जय से प्रज्ञा का आलोक (प्रकाश) प्रकट होता है।
  6. 3.6तस्य भूमिषु विनियोगःtasya bhūmiṣu viniyogaḥउसका (संयम का) विनियोग भूमियों (क्रमिक अवस्थाओं) में होता है।
  7. 3.7त्रयमन्तरङ्गं पूर्वेभ्यःtrayam antar-aṅgaṃ pūrvebhyaḥये तीन पूर्व (पाँच अंगों) की अपेक्षा अन्तरंग हैं।
  8. 3.8तदपि बहिरङ्गं निर्बीजस्यtad api bahir-aṅgaṃ nirbījasyaवह (तीनों) भी निर्बीज (समाधि) की अपेक्षा बहिरंग है।
  9. 3.9व्युत्थाननिरोधसंस्कारयोरभिभवप्रादुर्भावौ निरोधक्षणचित्तान्वयो निरोधपरिणामःvyutthāna-nirodha-saṃskārayor abhibhava-prādurbhāvau nirodha-kṣaṇa-cittānvayo nirodha-pariṇāmaḥव्युत्थान और निरोध के संस्कारों का क्रमशः दबना और उठना, तथा निरोध-क्षण के साथ चित्त का अन्वय — यह निरोध-परिणाम है।
  10. 3.10तस्य प्रशान्तवाहिता संस्कारात्tasya praśānta-vāhitā saṃskārātउस (निरोध) संस्कार से चित्त की प्रशान्त-वाहिता (शान्त प्रवाह) होती है।
  11. 3.11सर्वार्थतैकाग्रतयोः क्षयोदयौ चित्तस्य समाधिपरिणामःsarvārthataikāgratayoḥ kṣayodayau cittasya samādhi-pariṇāmaḥसर्वार्थता (चंचलता) का क्षय और एकाग्रता का उदय — यह चित्त का समाधि-परिणाम है।
  12. 3.12ततः पुनः शान्तोदितौ तुल्यप्रत्ययौ चित्तस्यैकाग्रतापरिणामःtataḥ punaḥ śāntoditau tulya-pratyayau cittasyaikāgratā-pariṇāmaḥफिर शान्त और उदित प्रत्यय समान होने पर चित्त का एकाग्रता-परिणाम होता है।
  13. 3.13एतेन भूतेन्द्रियेषु धर्मलक्षणावस्थापरिणामा व्याख्याताःetena bhūtendriyeṣu dharma-lakṣaṇāvasthā-pariṇāmā vyākhyātāḥइसी से भूतों और इन्द्रियों में धर्म, लक्षण और अवस्था के परिणाम भी व्याख्यात हो जाते हैं।
  14. 3.14शान्तोदिताव्यपदेश्यधर्मानुपाती धर्मीśāntoditāvyapadeśya-dharmānupātī dharmīशान्त, उदित और अव्यपदेश्य (अप्रकट) धर्मों का अनुसरण करने वाला धर्मी (आधार) है।
  15. 3.15क्रमान्यत्वं परिणामान्यत्वे हेतुःkramānyatvaṃ pariṇāmānyatve hetuḥक्रम का भेद परिणाम के भेद का कारण है।
  16. 3.16परिणामत्रयसंयमादतीतानागतज्ञानम्pariṇāma-traya-saṃyamād atītānāgata-jñānamतीन परिणामों पर संयम से अतीत और अनागत (भूत-भविष्य) का ज्ञान होता है।
  17. 3.17शब्दार्थप्रत्ययानामितरेतराध्यासात्संकरस्तत्प्रविभागसंयमात्सर्वभूतरुतज्ञानम्śabdārtha-pratyayānām itaretarādhyāsāt saṃkaras tat-pravibhāga-saṃyamāt sarva-bhūta-ruta-jñānamशब्द, अर्थ और प्रत्यय के परस्पर अध्यास से संकर (मिश्रण) होता है; उनके विभाग पर संयम से सभी प्राणियों के शब्दों (वाणी) का ज्ञान होता है।
  18. 3.18संस्कारसाक्षात्करणात्पूर्वजातिज्ञानम्saṃskāra-sākṣāt-karaṇāt pūrva-jāti-jñānamसंस्कारों के साक्षात्कार से पूर्व-जन्मों का ज्ञान होता है।
  19. 3.19प्रत्ययस्य परचित्तज्ञानम्pratyayasya para-citta-jñānam(दूसरे के) प्रत्यय पर संयम से पर-चित्त (दूसरों के मन) का ज्ञान होता है।
  20. 3.20न च तत्सालम्बनं तस्याविषयीभूतत्वात्na ca tat sālambanaṃ tasyāviṣayī-bhūtatvātकिन्तु उसका आलम्बन (विषय) नहीं जाना जाता, क्योंकि वह इस ज्ञान का विषय नहीं है।
  21. 3.21कायरूपसंयमात्तद्ग्राह्यशक्तिस्तम्भे चक्षुःप्रकाशासंप्रयोगेऽन्तर्धानम्kāya-rūpa-saṃyamāt tad-grāhya-śakti-stambhe cakṣuḥ-prakāśāsaṃprayoge 'ntardhānamकाय के रूप पर संयम से उसकी ग्राह्य-शक्ति के स्तम्भित होने पर, नेत्र के प्रकाश से असंप्रयोग होने पर अन्तर्धान (अदृश्यता) होता है।
  22. 3.22सोपक्रमं निरुपक्रमं च कर्म तत्संयमादपरान्तज्ञानमरिष्टेभ्यो वाsopakramaṃ nirupakramaṃ ca karma tat-saṃyamād aparānta-jñānam ariṣṭebhyo vāकर्म सोपक्रम (शीघ्र फल देने वाला) और निरुपक्रम (विलम्ब से फल देने वाला) होता है; उस पर संयम से, अथवा अरिष्टों (अपशकुनों) से, मृत्यु (अपरान्त) का ज्ञान होता है।
  23. 3.23मैत्र्यादिषु बलानिmaitry-ādiṣu balāniमैत्री आदि (भावनाओं) पर संयम से उनके बल प्राप्त होते हैं।
  24. 3.24बलेषु हस्तिबलादीनिbaleṣu hasti-balādīniबलों पर संयम से हाथी आदि का बल प्राप्त होता है।
  25. 3.25प्रवृत्त्यालोकन्यासात्सूक्ष्मव्यवहितविप्रकृष्टज्ञानम्pravṛtty-āloka-nyāsāt sūkṣma-vyavahita-viprakṛṣṭa-jñānamप्रवृत्ति (उच्चतर ज्योति) के आलोक के न्यास से सूक्ष्म, व्यवहित (ढके) और विप्रकृष्ट (दूरस्थ) का ज्ञान होता है।
  26. 3.26भुवनज्ञानं सूर्ये संयमात्bhuvana-jñānaṃ sūrye saṃyamātसूर्य पर संयम से भुवनों (लोकों) का ज्ञान होता है।
  27. 3.27चन्द्रे ताराव्यूहज्ञानम्candre tārā-vyūha-jñānamचन्द्र पर संयम से ताराओं के व्यूह (रचना) का ज्ञान होता है।
  28. 3.28ध्रुवे तद्गतिज्ञानम्dhruve tad-gati-jñānamध्रुव तारे पर संयम से ताराओं की गति का ज्ञान होता है।
  29. 3.29नाभिचक्रे कायव्यूहज्ञानम्nābhi-cakre kāya-vyūha-jñānamनाभि-चक्र पर संयम से काय-व्यूह (शरीर की रचना) का ज्ञान होता है।
  30. 3.30कण्ठकूपे क्षुत्पिपासानिवृत्तिःkaṇṭha-kūpe kṣut-pipāsā-nivṛttiḥकण्ठ-कूप पर संयम से क्षुधा और पिपासा (भूख-प्यास) की निवृत्ति होती है।
  31. 3.31कूर्मनाड्यां स्थैर्यम्kūrma-nāḍyāṃ sthairyamकूर्म-नाड़ी पर संयम से स्थिरता प्राप्त होती है।
  32. 3.32मूर्धज्योतिषि सिद्धदर्शनम्mūrdha-jyotiṣi siddha-darśanamमूर्ध-ज्योति (मस्तक की ज्योति) पर संयम से सिद्धों का दर्शन होता है।
  33. 3.33प्रातिभाद्वा सर्वम्prātibhād vā sarvamअथवा प्रातिभ (सहज प्रतिभा) से सब कुछ (जाना जाता है)।
  34. 3.34हृदये चित्तसंवित्hṛdaye citta-saṃvitहृदय पर संयम से चित्त का संवित् (ज्ञान) होता है।
  35. 3.35सत्त्वपुरुषयोरत्यन्तासंकीर्णयोः प्रत्ययाविशेषो भोगः परार्थत्वात्स्वार्थसंयमात्पुरुषज्ञानम्sattva-puruṣayor atyantāsaṃkīrṇayoḥ pratyayāviśeṣo bhogaḥ parārthatvāt svārtha-saṃyamāt puruṣa-jñānamसत्त्व (बुद्धि) और पुरुष — अत्यन्त भिन्न होते हुए भी — के प्रत्यय में अभेद से भोग होता है; (बुद्धि के) परार्थ होने से, स्वार्थ (पुरुष के प्रयोजन) पर संयम से पुरुष का ज्ञान होता है।
  36. 3.36ततः प्रातिभश्रावणवेदनादर्शास्वादवार्ता जायन्तेtataḥ prātibha-śrāvaṇa-vedanādarśāsvāda-vārtā jāyanteउससे प्रातिभ (अन्तर्ज्ञान) तथा दिव्य श्रवण, वेदन, दर्शन, आस्वाद और वार्ता (गन्ध) उत्पन्न होते हैं।
  37. 3.37ते समाधावुपसर्गा व्युत्थाने सिद्धयःte samādhāv upasargā vyutthāne siddhayaḥये समाधि में उपसर्ग (विघ्न) हैं, यद्यपि व्युत्थान (सांसारिक) अवस्था में सिद्धियाँ हैं।
  38. 3.38बन्धकारणशैथिल्यात्प्रचारसंवेदनाच्च चित्तस्य परशरीरावेशःbandha-kāraṇa-śaithilyāt pracāra-saṃvedanāc ca cittasya para-śarīrāveśaḥबन्ध के कारण की शिथिलता से और (चित्त के) प्रचार-मार्गों के संवेदन से चित्त का पर-शरीर में आवेश (प्रवेश) होता है।
  39. 3.39उदानजयाज्जलपङ्ककण्टकादिष्वसङ्ग उत्क्रान्तिश्चudāna-jayāj jala-paṅka-kaṇṭakādiṣv asaṅga utkrāntiś caउदान वायु के जय से जल, पंक (कीचड़), काँटे आदि से असंग (ऊपर उठना) और उत्क्रान्ति (सचेत मृत्यु-गमन) होती है।
  40. 3.40समानजयाज्ज्वलनम्samāna-jayāj jvalanamसमान वायु के जय से ज्वलन (तेज/दीप्ति) प्राप्त होती है।
  41. 3.41श्रोत्राकाशयोः संबन्धसंयमाद्दिव्यं श्रोत्रम्śrotrākāśayoḥ saṃbandha-saṃyamād divyaṃ śrotramश्रोत्र और आकाश के संबंध पर संयम से दिव्य श्रोत्र (श्रवण) प्राप्त होता है।
  42. 3.42कायाकाशयोः संबन्धसंयमाल्लघुतूलसमापत्तेश्चाकाशगमनम्kāyākāśayoḥ saṃbandha-saṃyamāl laghu-tūla-samāpatteś cākāśa-gamanamकाय और आकाश के संबंध पर संयम से, तथा हल्के रुई जैसी समापत्ति से, आकाश-गमन होता है।
  43. 3.43बहिरकल्पिता वृत्तिर्महाविदेहा ततः प्रकाशावरणक्षयःbahir akalpitā vṛttir mahā-videhā tataḥ prakāśāvaraṇa-kṣayaḥशरीर के बाहर की अकल्पित (वास्तविक) वृत्ति महाविदेहा कहलाती है; उससे प्रकाश के आवरण का क्षय होता है।
  44. 3.44स्थूलस्वरूपसूक्ष्मान्वयार्थवत्त्वसंयमाद्भूतजयःsthūla-svarūpa-sūkṣmānvayārthavattva-saṃyamād bhūta-jayaḥभूतों के स्थूल, स्वरूप, सूक्ष्म, अन्वय और अर्थवत्त्व पर संयम से भूत-जय (तत्त्वों पर अधिकार) होता है।
  45. 3.45ततोऽणिमादिप्रादुर्भावः कायसम्पत्तद्धर्मानभिघातश्चtato 'ṇimādi-prādurbhāvaḥ kāya-sampat tad-dharmānabhighātaś caउससे अणिमा आदि (सिद्धियों) का प्रादुर्भाव, काय-सम्पत् (शरीर की पूर्णता) और उसके धर्मों का अनभिघात (अविनाशिता) होता है।
  46. 3.46रूपलावण्यबलवज्रसंहननत्वानि कायसम्पत्rūpa-lāvaṇya-bala-vajra-saṃhananatvāni kāya-sampatरूप, लावण्य, बल और वज्र जैसी दृढ़ता — यह काय-सम्पत् (शरीर की पूर्णता) है।
  47. 3.47ग्रहणस्वरूपास्मितान्वयार्थवत्त्वसंयमादिन्द्रियजयःgrahaṇa-svarūpāsmitānvayārthavattva-saṃyamād indriya-jayaḥग्रहण, स्वरूप, अस्मिता, अन्वय और अर्थवत्त्व पर संयम से इन्द्रिय-जय होता है।
  48. 3.48ततो मनोजवित्वं विकरणभावः प्रधानजयश्चtato mano-javitvaṃ vikaraṇa-bhāvaḥ pradhāna-jayaś caउससे मनोजवित्व (मन जैसी गति), विकरण-भाव (इन्द्रियों के बिना ज्ञान) और प्रधान-जय (प्रकृति पर अधिकार) प्राप्त होते हैं।
  49. 3.49सत्त्वपुरुषान्यताख्यातिमात्रस्य सर्वभावाधिष्ठातृत्वं सर्वज्ञातृत्वं चsattva-puruṣānyatā-khyāti-mātrasya sarva-bhāvādhiṣṭhātṛtvaṃ sarva-jñātṛtvaṃ caसत्त्व और पुरुष के भेद-ज्ञान मात्र में स्थित (योगी) को सर्व-भावों का अधिष्ठातृत्व और सर्वज्ञातृत्व प्राप्त होता है।
  50. 3.50तद्वैराग्यादपि दोषबीजक्षये कैवल्यम्tad-vairāgyād api doṣa-bīja-kṣaye kaivalyamउस (सर्वज्ञता) के प्रति भी वैराग्य से, दोष के बीज के क्षय होने पर कैवल्य प्राप्त होता है।
  51. 3.51स्थान्युपनिमन्त्रणे सङ्गस्मयाकरणं पुनरनिष्टप्रसङ्गात्sthāny-upanimantraṇe saṅga-smayākaraṇaṃ punar aniṣṭa-prasaṅgātस्थानी (उच्च लोक के) देवों के निमन्त्रण पर आसक्ति और गर्व न करे, अन्यथा फिर से अनिष्ट का प्रसंग हो सकता है।
  52. 3.52क्षणतत्क्रमयोः संयमाद्विवेकजं ज्ञानम्kṣaṇa-tat-kramayoḥ saṃyamād viveka-jaṃ jñānamक्षण और उसके क्रम पर संयम से विवेक-जनित ज्ञान उत्पन्न होता है।
  53. 3.53जातिलक्षणदेशैरन्यतानवच्छेदात्तुल्ययोस्ततः प्रतिपत्तिःjāti-lakṣaṇa-deśair anyatānavacchedāt tulyayos tataḥ pratipattiḥजाति, लक्षण और देश से भेद न होने पर भी, दो तुल्य (समान) वस्तुओं का भेद उस (विवेक-ज्ञान) से जाना जाता है।
  54. 3.54तारकं सर्वविषयं सर्वथाविषयमक्रमं चेति विवेकजं ज्ञानम्tārakaṃ sarva-viṣayaṃ sarvathā-viṣayam akramaṃ ceti viveka-jaṃ jñānamतारक (मुक्तिदायी), सर्व-विषयक, सब प्रकार से विषय वाला और अक्रम (युगपत्) — ऐसा विवेक-जनित ज्ञान है।
  55. 3.55सत्त्वपुरुषयोः शुद्धिसाम्ये कैवल्यम्sattva-puruṣayoḥ śuddhi-sāmye kaivalyamसत्त्व (बुद्धि) और पुरुष की शुद्धि के समान हो जाने पर कैवल्य होता है।