कैवल्य पाद
कैवल्य पर · 34 में से 34 सूत्र
- 4.1जन्मौषधिमन्त्रतपःसमाधिजाः सिद्धयःjanmauṣadhi-mantra-tapaḥ-samādhi-jāḥ siddhayaḥसिद्धियाँ जन्म, औषधि, मन्त्र, तप और समाधि से उत्पन्न होती हैं।
- 4.2जात्यन्तरपरिणामः प्रकृत्यापूरात्jāty-antara-pariṇāmaḥ prakṛty-āpūrātदूसरी जाति (योनि) में परिणाम प्रकृति के आपूरण (भर जाने) से होता है।
- 4.3निमित्तमप्रयोजकं प्रकृतीनां वरणभेदस्तु ततः क्षेत्रिकवत्nimittam aprayojakaṃ prakṛtīnāṃ varaṇa-bhedas tu tataḥ kṣetrikavatनिमित्त प्रकृतियों को प्रेरित नहीं करता; वह तो केवल बाधा (वरण) को हटाता है, किसान के (खेत सींचने) समान।
- 4.4निर्माणचित्तान्यस्मितामात्रात्nirmāṇa-cittāny asmitā-mātrātनिर्माण-चित्त (रचित मन) केवल अस्मिता (मात्र) से उत्पन्न होते हैं।
- 4.5प्रवृत्तिभेदे प्रयोजकं चित्तमेकमनेकेषाम्pravṛtti-bhede prayojakaṃ cittam ekam anekeṣāmअनेक (निर्माण-चित्तों) की भिन्न-भिन्न प्रवृत्तियों में एक (मूल) चित्त ही प्रयोजक (संचालक) होता है।
- 4.6तत्र ध्यानजमनाशयम्tatra dhyāna-jam anāśayamउनमें ध्यान से उत्पन्न चित्त कर्माशय (संचित कर्म) से रहित होता है।
- 4.7कर्माशुक्लाकृष्णं योगिनस्त्रिविधमितरेषाम्karmāśuklākṛṣṇaṃ yoginas tri-vidham itareṣāmयोगी का कर्म अशुक्ल-अकृष्ण (न श्वेत न कृष्ण) होता है; अन्यों का तीन प्रकार का।
- 4.8ततस्तद्विपाकानुगुणानामेवाभिव्यक्तिर्वासनानाम्tatas tad-vipākānuguṇānām evābhivyaktir vāsanānāmउससे (कर्म से) उसके विपाक के अनुकूल वासनाओं की ही अभिव्यक्ति होती है।
- 4.9जातिदेशकालव्यवहितानामप्यानन्तर्यं स्मृतिसंस्कारयोरेकरूपत्वात्jāti-deśa-kāla-vyavahitānām apy ānantaryaṃ smṛti-saṃskārayor eka-rūpatvātजाति, देश और काल से व्यवहित (दूर) होने पर भी आनन्तर्य (निरन्तरता) रहती है, क्योंकि स्मृति और संस्कार एकरूप हैं।
- 4.10तासामनादित्वं चाशिषो नित्यत्वात्tāsām anāditvaṃ cāśiṣo nityatvātउन (वासनाओं) का अनादित्व है, क्योंकि आशिष् (जीने की इच्छा) नित्य है।
- 4.11हेतुफलाश्रयालम्बनैः संगृहीतत्वादेषामभावे तदभावःhetu-phalāśrayālambanaiḥ saṃgṛhītatvād eṣām abhāve tad-abhāvaḥहेतु, फल, आश्रय और आलम्बन से संगृहीत होने के कारण, इनके अभाव में उन (वासनाओं) का भी अभाव हो जाता है।
- 4.12अतीतानागतं स्वरूपतोऽस्त्यध्वभेदाद्धर्माणाम्atītānāgataṃ svarūpato 'sty adhva-bhedād dharmāṇāmअतीत और अनागत (भूत-भविष्य) स्वरूपतः विद्यमान हैं, क्योंकि धर्मों के अध्व (काल-मार्ग) का भेद है।
- 4.13ते व्यक्तसूक्ष्मा गुणात्मानःte vyakta-sūkṣmā guṇātmānaḥवे (धर्म) व्यक्त या सूक्ष्म — गुणों के स्वरूप वाले हैं।
- 4.14परिणामैकत्वाद्वस्तुतत्त्वम्pariṇāmaikatvād vastu-tattvamपरिणाम की एकता के कारण वस्तु का तत्त्व (यथार्थता) है।
- 4.15वस्तुसाम्ये चित्तभेदात्तयोर्विभक्तः पन्थाःvastu-sāmye citta-bhedāt tayor vibhaktaḥ panthāḥवस्तु समान होने पर भी चित्तों के भेद से, उन दोनों (चित्त और वस्तु) का मार्ग अलग है।
- 4.16न चैकचित्ततन्त्रं वस्तु तदप्रमाणकं तदा किं स्यात्na caika-citta-tantraṃ vastu tad apramāṇakaṃ tadā kiṃ syātवस्तु किसी एक चित्त के अधीन नहीं; यदि वह उससे अप्रमाणित (अज्ञात) हो, तो वह तब क्या होगी?
- 4.17तदुपरागापेक्षित्वाच्चित्तस्य वस्तु ज्ञाताज्ञातम्tad-uparāgāpekṣitvāc cittasya vastu jñātājñātamचित्त के उसके द्वारा उपरक्त (रंजित) होने की अपेक्षा से वस्तु ज्ञात या अज्ञात होती है।
- 4.18सदा ज्ञाताश्चित्तवृत्तयस्तत्प्रभोः पुरुषस्यापरिणामित्वात्sadā jñātāś citta-vṛttayas tat-prabhoḥ puruṣasyāpariṇāmitvātचित्त की वृत्तियाँ अपने स्वामी पुरुष को सदा ज्ञात रहती हैं, क्योंकि पुरुष अपरिणामी (अपरिवर्तनशील) है।
- 4.19न तत्स्वाभासं दृश्यत्वात्na tat svābhāsaṃ dṛśyatvātवह (चित्त) स्वयं-प्रकाशी नहीं, क्योंकि वह दृश्य (ज्ञेय) है।
- 4.20एकसमये चोभयानवधारणम्eka-samaye cobhayānavadhāraṇamऔर एक ही समय में दोनों (स्व और विषय) का अवधारण (ज्ञान) नहीं हो सकता।
- 4.21चित्तान्तरदृश्ये बुद्धिबुद्धेरतिप्रसङ्गः स्मृतिसंकरश्चcittāntara-dṛśye buddhi-buddher atiprasaṅgaḥ smṛti-saṃkaraś caयदि चित्त को दूसरे चित्त से दृश्य माना जाए, तो बुद्धि की बुद्धि का अतिप्रसंग (अनवस्था) और स्मृति का संकर (मिश्रण) होगा।
- 4.22चितेरप्रतिसंक्रमायास्तदाकारापत्तौ स्वबुद्धिसंवेदनम्citer apratisaṃkramāyās tad-ākārāpattau sva-buddhi-saṃvedanamअप्रतिसंक्रम (अचल) चिति के आकार को जब (चित्त) धारण करता है, तब स्व-बुद्धि (आत्म) का संवेदन होता है।
- 4.23द्रष्टृदृश्योपरक्तं चित्तं सर्वार्थम्draṣṭṛ-dṛśyoparaktaṃ cittaṃ sarvārthamद्रष्टा और दृश्य दोनों से उपरक्त (रंजित) चित्त सर्वार्थ (सब कुछ ग्रहण करने वाला) होता है।
- 4.24तदसंख्येयवासनाभिश्चित्रमपि परार्थं संहत्यकारित्वात्tad asaṃkhyeya-vāsanābhiś citram api parārthaṃ saṃhatya-kāritvātअसंख्य वासनाओं से चित्र-विचित्र होने पर भी वह (चित्त) परार्थ (दूसरे के लिए) है, क्योंकि वह संहत्य (मिलकर) कार्य करता है।
- 4.25विशेषदर्शिन आत्मभावभावनाविनिवृत्तिःviśeṣa-darśina ātma-bhāva-bhāvanā-vinivṛttiḥविशेष (भेद) को देखने वाले की आत्म-भाव की भावना (चिन्तन) निवृत्त हो जाती है।
- 4.26तदा विवेकनिम्नं कैवल्यप्राग्भारं चित्तम्tadā viveka-nimnaṃ kaivalya-prāg-bhāraṃ cittamतब चित्त विवेक की ओर झुका हुआ और कैवल्य की ओर भार वाला (प्रवृत्त) हो जाता है।
- 4.27तच्छिद्रेषु प्रत्ययान्तराणि संस्कारेभ्यःtac-chidreṣu pratyayāntarāṇi saṃskārebhyaḥउस (विवेक) के छिद्रों (अन्तरालों) में संस्कारों से अन्य प्रत्यय उठ आते हैं।
- 4.28हानमेषां क्लेशवदुक्तम्hānam eṣāṃ kleśavad uktamइनका हान (निवारण) क्लेशों के समान (पूर्वोक्त रीति से) कहा गया है।
- 4.29प्रसंख्यानेऽप्यकुसीदस्य सर्वथा विवेकख्यातेर्धर्ममेघः समाधिःprasaṃkhyāne 'py akusīdasya sarvathā viveka-khyāter dharma-meghaḥ samādhiḥप्रसंख्यान (उच्चतम ध्यान) में भी निष्काम रहने वाले को, सर्वथा विवेक-ख्याति से धर्म-मेघ समाधि प्राप्त होती है।
- 4.30ततः क्लेशकर्मनिवृत्तिःtataḥ kleśa-karma-nivṛttiḥउससे क्लेश और कर्म की निवृत्ति होती है।
- 4.31तदा सर्वावरणमलापेतस्य ज्ञानस्यानन्त्याज्ज्ञेयमल्पम्tadā sarvāvaraṇa-malāpetasya jñānasyānantyāj jñeyam alpamतब समस्त आवरण-मल से रहित ज्ञान के अनन्त हो जाने से ज्ञेय अल्प (थोड़ा) रह जाता है।
- 4.32ततः कृतार्थानां परिणामक्रमसमाप्तिर्गुणानाम्tataḥ kṛtārthānāṃ pariṇāma-krama-samāptir guṇānāmउससे कृतार्थ (प्रयोजन पूर्ण कर चुके) गुणों के परिणाम-क्रम की समाप्ति हो जाती है।
- 4.33क्षणप्रतियोगी परिणामापरान्तनिर्ग्राह्यः क्रमःkṣaṇa-pratiyogī pariṇāmāparānta-nirgrāhyaḥ kramaḥक्षण के प्रतियोगी (सापेक्ष) तथा परिणाम के अपरान्त (अन्त) में ग्राह्य — ऐसा क्रम है।
- 4.34पुरुषार्थशून्यानां गुणानां प्रतिप्रसवः कैवल्यं स्वरूपप्रतिष्ठा वा चितिशक्तिरितिpuruṣārtha-śūnyānāṃ guṇānāṃ pratiprasavaḥ kaivalyaṃ svarūpa-pratiṣṭhā vā citi-śaktir itiपुरुष के लिए निष्प्रयोजन हुए गुणों का प्रतिप्रसव (मूल में लय) कैवल्य है — अथवा चिति-शक्ति की अपने स्वरूप में प्रतिष्ठा — ऐसा (यह शास्त्र समाप्त होता है)।