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साधना पाद

साधना पर · 55 में से 55 सूत्र

  1. 2.1तपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि क्रियायोगःtapaḥ-svādhyāyeśvara-praṇidhānāni kriyā-yogaḥतप, स्वाध्याय और ईश्वर-प्रणिधान — ये क्रियायोग हैं।
  2. 2.2समाधिभावनार्थः क्लेशतनूकरणार्थश्चsamādhi-bhāvanārthaḥ kleśa-tanū-karaṇārthaś caवह समाधि की भावना के लिए और क्लेशों को क्षीण करने के लिए (किया जाता है)।
  3. 2.3अविद्यास्मितारागद्वेषाभिनिवेशाः क्लेशाःavidyāsmitā-rāga-dveṣābhiniveśāḥ kleśāḥअविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश — ये क्लेश हैं।
  4. 2.4अविद्या क्षेत्रमुत्तरेषां प्रसुप्ततनुविच्छिन्नोदाराणाम्avidyā kṣetram uttareṣāṃ prasupta-tanu-vicchinnodārāṇāmअविद्या बाकी क्लेशों का क्षेत्र है — चाहे वे प्रसुप्त, क्षीण, विच्छिन्न या उदार (सक्रिय) हों।
  5. 2.5अनित्याशुचिदुःखानात्मसु नित्यशुचिसुखात्मख्यातिरविद्याanityāśuci-duḥkhānātmasu nitya-śuci-sukhātma-khyātir avidyāअनित्य, अशुचि, दुःख और अनात्म को नित्य, शुचि, सुख और आत्मा मान लेना अविद्या है।
  6. 2.6दृग्दर्शनशक्त्योरेकात्मतेवास्मिताdṛg-darśana-śaktyor ekātmatevāsmitāदृक्-शक्ति और दर्शन-शक्ति को मानो एक ही आत्मा समझ लेना अस्मिता है।
  7. 2.7सुखानुशयी रागःsukhānuśayī rāgaḥसुख के पीछे चलने वाला राग है।
  8. 2.8दुःखानुशयी द्वेषःduḥkhānuśayī dveṣaḥदुःख के पीछे चलने वाला द्वेष है।
  9. 2.9स्वरसवाही विदुषोऽपि तथारूढोऽभिनिवेशःsvarasavāhī viduṣo 'pi tathārūḍho 'bhiniveśaḥअपने ही वेग से बहने वाला अभिनिवेश विद्वान् में भी उसी प्रकार जड़ जमाए रहता है।
  10. 2.10ते प्रतिप्रसवहेयाः सूक्ष्माःte pratiprasava-heyāḥ sūkṣmāḥसूक्ष्म रूप में ये क्लेश प्रतिप्रसव (मूल में लौटाकर) से त्याज्य हैं।
  11. 2.11ध्यानहेयास्तद्वृत्तयःdhyāna-heyās tad-vṛttayaḥउनकी (स्थूल) वृत्तियाँ ध्यान से त्याज्य हैं।
  12. 2.12क्लेशमूलः कर्माशयो दृष्टादृष्टजन्मवेदनीयःkleśa-mūlaḥ karmāśayo dṛṣṭādṛṣṭa-janma-vedanīyaḥक्लेशों में मूल रखने वाला कर्माशय दृष्ट (इस) और अदृष्ट (आगामी) जन्मों में भोगा जाता है।
  13. 2.13सति मूले तद्विपाको जात्यायुर्भोगाःsati mūle tad-vipāko jāty-āyur-bhogāḥमूल के रहते हुए उसका विपाक जाति, आयु और भोग के रूप में होता है।
  14. 2.14ते ह्लादपरितापफलाः पुण्यापुण्यहेतुत्वात्te hlāda-paritāpa-phalāḥ puṇyāpuṇya-hetutvātपुण्य और अपुण्य के कारण होने से उनके फल ह्लाद (सुख) या परिताप (दुःख) होते हैं।
  15. 2.15परिणामतापसंस्कारदुःखैर्गुणवृत्तिविरोधाच्च दुःखमेव सर्वं विवेकिनःpariṇāma-tāpa-saṃskāra-duḥkhair guṇa-vṛtti-virodhāc ca duḥkham eva sarvaṃ vivekinaḥपरिणाम, ताप और संस्कार के दुःखों से तथा गुणों की वृत्तियों के विरोध से — विवेकी के लिए सब कुछ दुःख ही है।
  16. 2.16हेयं दुःखमनागतम्heyaṃ duḥkham anāgatamजो दुःख अभी आया नहीं, वही त्याज्य है।
  17. 2.17द्रष्टृदृश्ययोः संयोगो हेयहेतुःdraṣṭṛ-dṛśyayoḥ saṃyogo heya-hetuḥद्रष्टा और दृश्य का संयोग ही त्याज्य (दुःख) का कारण है।
  18. 2.18प्रकाशक्रियास्थितिशीलं भूतेन्द्रियात्मकं भोगापवर्गार्थं दृश्यम्prakāśa-kriyā-sthiti-śīlaṃ bhūtendriyātmakaṃ bhogāpavargārthaṃ dṛśyamदृश्य प्रकाश, क्रिया और स्थिति स्वभाव वाला, भूत और इन्द्रिय रूप, तथा भोग और अपवर्ग (मोक्ष) के लिए है।
  19. 2.19विशेषाविशेषलिङ्गमात्रालिङ्गानि गुणपर्वाणिviśeṣāviśeṣa-liṅga-mātrāliṅgāni guṇa-parvāṇiविशेष, अविशेष, लिङ्गमात्र और अलिङ्ग — ये गुणों की अवस्थाएँ (पर्व) हैं।
  20. 2.20द्रष्टा दृशिमात्रः शुद्धोऽपि प्रत्ययानुपश्यःdraṣṭā dṛśi-mātraḥ śuddho 'pi pratyayānupaśyaḥद्रष्टा केवल दृशि (चेतनामात्र) है; शुद्ध होते हुए भी वह प्रत्ययों (बुद्धि-वृत्तियों) के द्वारा देखता-सा प्रतीत होता है।
  21. 2.21तदर्थ एव दृश्यस्यात्माtad-artha eva dṛśyasyātmāदृश्य का स्वरूप उसी (द्रष्टा) के प्रयोजन के लिए ही है।
  22. 2.22कृतार्थं प्रति नष्टमप्यनष्टं तदन्यसाधारणत्वात्kṛtārthaṃ prati naṣṭam apy anaṣṭaṃ tad-anya-sādhāraṇatvātजिसका प्रयोजन पूरा हो गया उसके लिए दृश्य नष्ट-सा होते हुए भी नष्ट नहीं, क्योंकि वह अन्य (जीवों) के लिए साधारण है।
  23. 2.23स्वस्वामिशक्त्योः स्वरूपोपलब्धिहेतुः संयोगःsva-svāmi-śaktyoḥ svarūpopalabdhi-hetuḥ saṃyogaḥसंयोग स्व (दृश्य) और स्वामी (द्रष्टा) की शक्तियों के स्वरूप की उपलब्धि का हेतु है।
  24. 2.24तस्य हेतुरविद्याtasya hetur avidyāउस (संयोग) का कारण अविद्या है।
  25. 2.25तदभावात्संयोगाभावो हानं तद्दृशेः कैवल्यम्tad-abhāvāt saṃyogābhāvo hānaṃ tad dṛśeḥ kaivalyamउस (अविद्या) के अभाव से संयोग का अभाव — वही हान है; वह द्रष्टा का कैवल्य है।
  26. 2.26विवेकख्यातिरविप्लवा हानोपायःviveka-khyātir aviplavā hānopāyaḥअविचल विवेक-ख्याति ही हान (दुःख-निवृत्ति) का उपाय है।
  27. 2.27तस्य सप्तधा प्रान्तभूमिः प्रज्ञाtasya saptadhā prānta-bhūmiḥ prajñāउसकी अन्तिम भूमि की प्रज्ञा सात प्रकार की होती है।
  28. 2.28योगाङ्गानुष्ठानादशुद्धिक्षये ज्ञानदीप्तिरा विवेकख्यातेःyogāṅgānuṣṭhānād aśuddhi-kṣaye jñāna-dīptir ā viveka-khyāteḥयोग के अंगों के अनुष्ठान से अशुद्धि के क्षय होने पर, विवेक-ख्याति तक ज्ञान की दीप्ति प्रकट होती है।
  29. 2.29यमनियमासनप्राणायामप्रत्याहारधारणाध्यानसमाधयोऽष्टावङ्गानिyama-niyamāsana-prāṇāyāma-pratyāhāra-dhāraṇā-dhyāna-samādhayo 'ṣṭāv aṅgāniयम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि — ये आठ अंग हैं।
  30. 2.30अहिंसासत्यास्तेयब्रह्मचर्यापरिग्रहा यमाःahiṃsā-satyāsteya-brahmacaryāparigrahā yamāḥअहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह — ये यम हैं।
  31. 2.31जातिदेशकालसमयानवच्छिन्नाः सार्वभौमा महाव्रतम्jāti-deśa-kāla-samayānavacchinnāḥ sārvabhaumā mahā-vratamजाति, देश, काल और समय से अनवच्छिन्न, सर्वत्र लागू ये यम महाव्रत हैं।
  32. 2.32शौचसंतोषतपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि नियमाःśauca-saṃtoṣa-tapaḥ-svādhyāyeśvara-praṇidhānāni niyamāḥशौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर-प्रणिधान — ये नियम हैं।
  33. 2.33वितर्कबाधने प्रतिपक्षभावनम्vitarka-bādhane pratipakṣa-bhāvanamवितर्क (कुविचार) के बाधा डालने पर प्रतिपक्ष की भावना (करे)।
  34. 2.34वितर्का हिंसादयः कृतकारितानुमोदिता लोभक्रोधमोहपूर्वका मृदुमध्याधिमात्रा दुःखाज्ञानानन्तफला इति प्रतिपक्षभावनम्vitarkā hiṃsādayaḥ kṛta-kāritānumoditā lobha-krodha-moha-pūrvakā mṛdu-madhyādhimātrā duḥkhājñānānanta-phalā iti pratipakṣa-bhāvanamहिंसा आदि वितर्क — किए, कराए या अनुमोदित; लोभ, क्रोध, मोह पूर्वक; मृदु, मध्यम या तीव्र — दुःख और अज्ञान के अनन्त फल वाले हैं; ऐसा प्रतिपक्ष-भावन (करे)।
  35. 2.35अहिंसाप्रतिष्ठायां तत्सन्निधौ वैरत्यागःahiṃsā-pratiṣṭhāyāṃ tat-sannidhau vaira-tyāgaḥअहिंसा के प्रतिष्ठित होने पर उसके समीप (सभी प्राणी) वैर का त्याग कर देते हैं।
  36. 2.36सत्यप्रतिष्ठायां क्रियाफलाश्रयत्वम्satya-pratiṣṭhāyāṃ kriyā-phalāśrayatvamसत्य के प्रतिष्ठित होने पर क्रिया और उसके फल उसी के आश्रित हो जाते हैं।
  37. 2.37अस्तेयप्रतिष्ठायां सर्वरत्नोपस्थानम्asteya-pratiṣṭhāyāṃ sarva-ratnopasthānamअस्तेय के प्रतिष्ठित होने पर सभी रत्न (सम्पदाएँ) स्वयं उपस्थित हो जाते हैं।
  38. 2.38ब्रह्मचर्यप्रतिष्ठायां वीर्यलाभःbrahmacarya-pratiṣṭhāyāṃ vīrya-lābhaḥब्रह्मचर्य के प्रतिष्ठित होने पर वीर्य (ओज) की प्राप्ति होती है।
  39. 2.39अपरिग्रहस्थैर्ये जन्मकथन्तासंबोधःaparigraha-sthairye janma-kathantā-saṃbodhaḥअपरिग्रह के स्थिर होने पर जन्म के स्वरूप (कैसे और क्यों) का संबोध होता है।
  40. 2.40शौचात्स्वाङ्गजुगुप्सा परैरसंसर्गःśaucāt svāṅga-jugupsā parair asaṃsargaḥशौच से अपने शरीर के प्रति अनासक्ति (जुगुप्सा) और दूसरों (के शरीरों) से असंसर्ग उत्पन्न होता है।
  41. 2.41सत्त्वशुद्धिसौमनस्यैकाग्र्येन्द्रियजयात्मदर्शनयोग्यत्वानि चsattva-śuddhi-saumanasyaikāgryendriya-jayātma-darśana-yogyatvāni caतथा (शौच से) सत्त्वशुद्धि, सौमनस्य, एकाग्रता, इन्द्रिय-जय और आत्म-दर्शन की योग्यता भी प्राप्त होती है।
  42. 2.42संतोषादनुत्तमः सुखलाभःsaṃtoṣād anuttamaḥ sukha-lābhaḥसंतोष से अनुत्तम (सर्वश्रेष्ठ) सुख की प्राप्ति होती है।
  43. 2.43कायेन्द्रियसिद्धिरशुद्धिक्षयात्तपसःkāyendriya-siddhir aśuddhi-kṣayāt tapasaḥतप से अशुद्धि के क्षय होने पर काय और इन्द्रियों की सिद्धि होती है।
  44. 2.44स्वाध्यायादिष्टदेवतासंप्रयोगःsvādhyāyād iṣṭa-devatā-saṃprayogaḥस्वाध्याय से इष्ट-देवता के साथ संप्रयोग (संयोग) होता है।
  45. 2.45समाधिसिद्धिरीश्वरप्रणिधानात्samādhi-siddhir īśvara-praṇidhānātईश्वर-प्रणिधान से समाधि की सिद्धि होती है।
  46. 2.46स्थिरसुखमासनम्sthira-sukham āsanamआसन स्थिर और सुखपूर्वक (होना चाहिए)।
  47. 2.47प्रयत्नशैथिल्यानन्तसमापत्तिभ्याम्prayatna-śaithilyānanta-samāpattibhyāmप्रयत्न की शिथिलता और अनन्त में समापत्ति से (आसन सिद्ध होता है)।
  48. 2.48ततो द्वन्द्वानभिघातःtato dvandvānabhighātaḥउससे द्वन्द्वों (सुख-दुःख आदि) का अभिघात नहीं होता।
  49. 2.49तस्मिन्सति श्वासप्रश्वासयोर्गतिविच्छेदः प्राणायामःtasmin sati śvāsa-praśvāsayor gati-vicchedaḥ prāṇāyāmaḥउस (आसन) के सिद्ध होने पर श्वास और प्रश्वास की गति का विच्छेद प्राणायाम है।
  50. 2.50बाह्याभ्यन्तरस्तम्भवृत्तिर्देशकालसंख्याभिः परिदृष्टो दीर्घसूक्ष्मःbāhyābhyantara-stambha-vṛttir deśa-kāla-saṃkhyābhiḥ paridṛṣṭo dīrgha-sūkṣmaḥबाह्य, आभ्यन्तर और स्तम्भ वृत्ति वाला, देश-काल-संख्या से परिदृष्ट (नियंत्रित) प्राणायाम दीर्घ और सूक्ष्म हो जाता है।
  51. 2.51बाह्याभ्यन्तरविषयाक्षेपी चतुर्थःbāhyābhyantara-viṣayākṣepī caturthaḥबाह्य और आभ्यन्तर विषयों का अतिक्रमण करने वाला चौथा प्राणायाम है।
  52. 2.52ततः क्षीयते प्रकाशावरणम्tataḥ kṣīyate prakāśāvaraṇamउससे प्रकाश को ढकने वाला आवरण क्षीण हो जाता है।
  53. 2.53धारणासु च योग्यता मनसःdhāraṇāsu ca yogyatā manasaḥऔर मन में धारणाओं के लिए योग्यता आ जाती है।
  54. 2.54स्वविषयासंप्रयोगे चित्तस्य स्वरूपानुकार इवेन्द्रियाणां प्रत्याहारःsva-viṣayāsaṃprayoge cittasya svarūpānukāra ivendriyāṇāṃ pratyāhāraḥअपने विषयों से असंप्रयोग होने पर इन्द्रियों का मानो चित्त के स्वरूप का अनुकरण करना प्रत्याहार है।
  55. 2.55ततः परमा वश्यतेन्द्रियाणाम्tataḥ paramā vaśyatendriyāṇāmउससे इन्द्रियों की परम वश्यता (पूर्ण वशीकरण) प्राप्त होती है।