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समाधि पाद

समाधि पर · 51 में से 51 सूत्र

  1. 1.1अथ योगानुशासनम्atha yogānuśāsanamअब योग का अनुशासन (आरम्भ होता है)।
  2. 1.2योगश्चित्तवृत्तिनिरोधःyogaś citta-vṛtti-nirodhaḥयोग चित्त की वृत्तियों का निरोध है।
  3. 1.3तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्tadā draṣṭuḥ svarūpe 'vasthānamतब द्रष्टा अपने स्वरूप में स्थित हो जाता है।
  4. 1.4वृत्तिसारूप्यमितरत्रvṛtti-sārūpyam itaratraअन्य समय में (द्रष्टा) वृत्तियों के रूप में तदाकार हो जाता है।
  5. 1.5वृत्तयः पञ्चतय्यः क्लिष्टाक्लिष्टाःvṛttayaḥ pañcatayyaḥ kliṣṭākliṣṭāḥवृत्तियाँ पाँच प्रकार की हैं — क्लिष्ट और अक्लिष्ट।
  6. 1.6प्रमाणविपर्ययविकल्पनिद्रास्मृतयःpramāṇa-viparyaya-vikalpa-nidrā-smṛtayaḥवे हैं — प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा और स्मृति।
  7. 1.7प्रत्यक्षानुमानागमाः प्रमाणानिpratyakṣānumānāgamāḥ pramāṇāniप्रत्यक्ष, अनुमान और आगम — ये प्रमाण हैं।
  8. 1.8विपर्ययो मिथ्याज्ञानमतद्रूपप्रतिष्ठम्viparyayo mithyā-jñānam atad-rūpa-pratiṣṭhamविपर्यय वह मिथ्या ज्ञान है जो वस्तु के यथार्थ रूप पर आधारित नहीं।
  9. 1.9शब्दज्ञानानुपाती वस्तुशून्यो विकल्पःśabda-jñānānupātī vastu-śūnyo vikalpaḥशब्द और ज्ञान के अनुसरण से उत्पन्न, किन्तु वस्तु से रहित — वह विकल्प है।
  10. 1.10अभावप्रत्ययालम्बना वृत्तिर्निद्राabhāva-pratyayālambanā vṛttir nidrāअभाव की प्रतीति पर आश्रित वृत्ति निद्रा है।
  11. 1.11अनुभूतविषयासंप्रमोषः स्मृतिःanubhūta-viṣayāsaṃpramoṣaḥ smṛtiḥअनुभव किए गए विषय का न छूटना (धारण) स्मृति है।
  12. 1.12अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोधःabhyāsa-vairāgyābhyāṃ tan-nirodhaḥउनका निरोध अभ्यास और वैराग्य से होता है।
  13. 1.13तत्र स्थितौ यत्नोऽभ्यासःtatra sthitau yatno 'bhyāsaḥउनमें स्थिति के लिए किया गया यत्न अभ्यास है।
  14. 1.14स तु दीर्घकालनैरन्तर्यसत्कारासेवितो दृढभूमिःsa tu dīrgha-kāla-nairantarya-satkārāsevito dṛḍha-bhūmiḥदीर्घ काल तक, निरन्तर और श्रद्धापूर्वक सेवित होने पर वह (अभ्यास) दृढ़ भूमि वाला हो जाता है।
  15. 1.15दृष्टानुश्रविकविषयवितृष्णस्य वशीकारसंज्ञा वैराग्यम्dṛṣṭānuśravika-viṣaya-vitṛṣṇasya vaśīkāra-saṃjñā vairāgyamदेखे या सुने हुए विषयों की तृष्णा से रहित व्यक्ति की वशीकार-संज्ञा वैराग्य है।
  16. 1.16तत्परं पुरुषख्यातेर्गुणवैतृष्ण्यम्tat-paraṃ puruṣa-khyāter guṇa-vaitṛṣṇyamउससे उच्च वह वैराग्य है जिसमें पुरुष के ज्ञान से गुणों के प्रति भी तृष्णा नहीं रहती।
  17. 1.17वितर्कविचारानन्दास्मितारूपानुगमात्संप्रज्ञातःvitarka-vicārānandāsmitā-rūpānugamāt saṃprajñātaḥवितर्क, विचार, आनन्द और अस्मिता के साथ होने से वह संप्रज्ञात समाधि है।
  18. 1.18विरामप्रत्ययाभ्यासपूर्वः संस्कारशेषोऽन्यःvirāma-pratyayābhyāsa-pūrvaḥ saṃskāra-śeṣo 'nyaḥविराम-प्रत्यय के अभ्यास से पूर्वक, केवल संस्कार-शेष रहने वाली दूसरी (असंप्रज्ञात) समाधि है।
  19. 1.19भवप्रत्ययो विदेहप्रकृतिलयानाम्bhava-pratyayo videha-prakṛti-layānāmविदेह और प्रकृतिलय योगियों के लिए वह भव-प्रत्यय (जन्म के कारण) होती है।
  20. 1.20श्रद्धावीर्यस्मृतिसमाधिप्रज्ञापूर्वक इतरेषाम्śraddhā-vīrya-smṛti-samādhi-prajñā-pūrvaka itareṣāmअन्यों के लिए वह श्रद्धा, वीर्य, स्मृति, समाधि और प्रज्ञा के पूर्वक होती है।
  21. 1.21तीव्रसंवेगानामासन्नःtīvra-saṃvegānām āsannaḥतीव्र संवेग (उत्कट अभिलाषा) वालों के लिए वह समीप है।
  22. 1.22मृदुमध्याधिमात्रत्वात्ततोऽपि विशेषःmṛdu-madhyādhimātratvāt tato 'pi viśeṣaḥमृदु, मध्यम और अधिमात्र (तीव्र) होने के कारण उनमें भी भेद है।
  23. 1.23ईश्वरप्रणिधानाद्वाīśvara-praṇidhānād vāअथवा ईश्वर के प्रति समर्पण से (वह प्राप्त होती है)।
  24. 1.24क्लेशकर्मविपाकाशयैरपरामृष्टः पुरुषविशेष ईश्वरःkleśa-karma-vipākāśayair aparāmṛṣṭaḥ puruṣa-viśeṣa īśvaraḥक्लेश, कर्म, विपाक और आशय से अछूता एक विशेष पुरुष ईश्वर है।
  25. 1.25तत्र निरतिशयं सर्वज्ञबीजम्tatra niratiśayaṃ sarvajña-bījamउसमें सर्वज्ञता का बीज निरतिशय (सर्वोच्च) है।
  26. 1.26स पूर्वेषामपि गुरुः कालेनानवच्छेदात्sa pūrveṣām api guruḥ kālenānavacchedātकाल से अवच्छिन्न न होने के कारण वह पूर्वजों का भी गुरु है।
  27. 1.27तस्य वाचकः प्रणवःtasya vācakaḥ praṇavaḥउसका वाचक प्रणव (ॐ) है।
  28. 1.28तज्जपस्तदर्थभावनम्taj-japas tad-artha-bhāvanamउसका जप और उसके अर्थ की भावना (करनी चाहिए)।
  29. 1.29ततः प्रत्यक्चेतनाधिगमोऽप्यन्तरायाभावश्चtataḥ pratyak-cetanādhigamo 'py antarāyābhāvaś caउससे अन्तरात्मा का ज्ञान तथा विघ्नों का अभाव होता है।
  30. 1.30व्याधिस्त्यानसंशयप्रमादालस्याविरतिभ्रान्तिदर्शनालब्धभूमिकत्वानवस्थितत्वानि चित्तविक्षेपास्तेऽन्तरायाःvyādhi-styāna-saṃśaya-pramādālasyāvirati-bhrānti-darśanālabdha-bhūmikatvānavasthitatvāni citta-vikṣepās te 'ntarāyāḥव्याधि, स्त्यान, संशय, प्रमाद, आलस्य, अविरति, भ्रान्तिदर्शन, अलब्धभूमिकत्व और अनवस्थितत्व — ये चित्त के विक्षेप ही अन्तराय हैं।
  31. 1.31दुःखदौर्मनस्याङ्गमेजयत्वश्वासप्रश्वासा विक्षेपसहभुवःduḥkha-daurmanasyāṅgam-ejayatva-śvāsa-praśvāsā vikṣepa-sahabhuvaḥदुःख, दौर्मनस्य, अंगों का कम्पन, श्वास और प्रश्वास — ये विक्षेपों के सहभावी हैं।
  32. 1.32तत्प्रतिषेधार्थमेकतत्त्वाभ्यासःtat-pratiṣedhārtham eka-tattvābhyāsaḥउनके निवारण के लिए एक तत्त्व का अभ्यास (किया जाए)।
  33. 1.33मैत्रीकरुणामुदितोपेक्षाणां सुखदुःखपुण्यापुण्यविषयाणां भावनातश्चित्तप्रसादनम्maitrī-karuṇā-muditopekṣāṇāṃ sukha-duḥkha-puṇyāpuṇya-viṣayāṇāṃ bhāvanātaś citta-prasādanamसुख, दुःख, पुण्य और अपुण्य के विषय में क्रमशः मैत्री, करुणा, मुदिता और उपेक्षा की भावना से चित्त प्रसन्न होता है।
  34. 1.34प्रच्छर्दनविधारणाभ्यां वा प्राणस्यpracchardana-vidhāraṇābhyāṃ vā prāṇasyaअथवा प्राण के रेचन (प्रच्छर्दन) और धारण से (चित्त स्थिर होता है)।
  35. 1.35विषयवती वा प्रवृत्तिरुत्पन्ना मनसः स्थितिनिबन्धनीviṣayavatī vā pravṛttir utpannā manasaḥ sthiti-nibandhanīअथवा उत्पन्न हुई विषयवती प्रवृत्ति मन को स्थिति में बाँधने वाली होती है।
  36. 1.36विशोका वा ज्योतिष्मतीviśokā vā jyotiṣmatīअथवा शोकरहित, ज्योतिर्मयी (अवस्था से चित्त स्थिर होता है)।
  37. 1.37वीतरागविषयं वा चित्तम्vīta-rāga-viṣayaṃ vā cittamअथवा वीतराग (आसक्तिरहित) को विषय बनाने वाला चित्त।
  38. 1.38स्वप्ननिद्राज्ञानालम्बनं वाsvapna-nidrā-jñānālambanaṃ vāअथवा स्वप्न और निद्रा के ज्ञान का आलम्बन लेने से।
  39. 1.39यथाभिमतध्यानाद्वाyathābhimata-dhyānād vāअथवा जैसा अभीष्ट हो उसके ध्यान से।
  40. 1.40परमाणुपरममहत्त्वान्तोऽस्य वशीकारःparamāṇu-parama-mahattvānto 'sya vaśīkāraḥपरमाणु से लेकर परम महत्तत्त्व तक उसका वशीकार (अधिकार) फैलता है।
  41. 1.41क्षीणवृत्तेरभिजातस्येव मणेर्ग्रहीतृग्रहणग्राह्येषु तत्स्थतदञ्जनता समापत्तिःkṣīṇa-vṛtter abhijātasyeva maṇer grahītṛ-grahaṇa-grāhyeṣu tat-stha-tad-añjanatā samāpattiḥवृत्तियों के क्षीण होने पर, स्वच्छ मणि के समान चित्त ग्रहीता, ग्रहण और ग्राह्य में जिस पर टिकता है उसी का रूप ले लेता है — यह समापत्ति है।
  42. 1.42तत्र शब्दार्थज्ञानविकल्पैः संकीर्णा सवितर्का समापत्तिःtatra śabdārtha-jñāna-vikalpaiḥ saṃkīrṇā savitarkā samāpattiḥउनमें शब्द, अर्थ और ज्ञान के विकल्पों से मिश्रित समापत्ति सवितर्का है।
  43. 1.43स्मृतिपरिशुद्धौ स्वरूपशून्येवार्थमात्रनिर्भासा निर्वितर्काsmṛti-pariśuddhau svarūpa-śūnyevārtha-mātra-nirbhāsā nirvitarkāस्मृति के परिशुद्ध होने पर, मानो अपने स्वरूप से शून्य होकर केवल अर्थमात्र का भास कराने वाली निर्वितर्का (समापत्ति) होती है।
  44. 1.44एतयैव सविचारा निर्विचारा च सूक्ष्मविषया व्याख्याताetayaiva savicārā nirvicārā ca sūkṣma-viṣayā vyākhyātāइसी से सूक्ष्म विषय वाली सविचारा और निर्विचारा समापत्तियाँ भी व्याख्यात हो जाती हैं।
  45. 1.45सूक्ष्मविषयत्वं चालिङ्गपर्यवसानम्sūkṣma-viṣayatvaṃ cāliṅga-paryavasānamऔर सूक्ष्म विषयता अलिङ्ग (अव्यक्त प्रकृति) तक पर्यवसित होती है।
  46. 1.46ता एव सबीजः समाधिःtā eva sabījaḥ samādhiḥये ही सबीज समाधि हैं।
  47. 1.47निर्विचारवैशारद्येऽध्यात्मप्रसादःnirvicāra-vaiśāradye 'dhyātma-prasādaḥनिर्विचार (समाधि) में निपुणता होने पर अध्यात्म-प्रसाद (आन्तरिक निर्मलता) प्राप्त होती है।
  48. 1.48ऋतंभरा तत्र प्रज्ञाṛtaṃbharā tatra prajñāउसमें प्रज्ञा ऋतंभरा (सत्य से भरी) होती है।
  49. 1.49श्रुतानुमानप्रज्ञाभ्यामन्यविषया विशेषार्थत्वात्śrutānumāna-prajñābhyām anya-viṣayā viśeṣārthatvātश्रुत (आगम) और अनुमान से प्राप्त प्रज्ञा से यह अन्य विषय वाली है, क्योंकि इसका विषय विशेष है।
  50. 1.50तज्जः संस्कारोऽन्यसंस्कारप्रतिबन्धीtaj-jaḥ saṃskāro 'nya-saṃskāra-pratibandhīउससे उत्पन्न संस्कार अन्य संस्कारों का प्रतिबन्धक (निरोधक) होता है।
  51. 1.51तस्यापि निरोधे सर्वनिरोधान्निर्बीजः समाधिःtasyāpi nirodhe sarva-nirodhān nirbījaḥ samādhiḥउसका भी निरोध हो जाने पर, सबके निरुद्ध होने से, निर्बीज समाधि होती है।